शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

प्रधान सम्पादक की कलम से

जन सहयोग ने बनाया चुनौती को आसान

इसमें कोई दो राय नहीं है कि लम्बे इंतजार के बाद जब कोई इच्छा परवान चढ़ती है तो उसका आनंद पहले से कई गुणा अधिक होता है। ऐसा मेरे साथ भी हुआ जब सैनी संवाद के पहले अंक के प्रकाशन के बाद प्रदेश के विभिन्न कोनों में रह रहे सैनी समाज के जागरूक लोगों ने मुझे पत्र लिखकर इस बारे बधाई दी। यह खुशी महज बधाई संदेश प्राप्त करने मात्र से नहीं थी, बल्कि उस मानसिक संतुष्टि से भी थी जो मेरे व मेरी टीम द्वारा किए गए प्रयासों को मिली जनप्रतिक्रिया के आधार पर कसौटी पर खरा साबित कर रही थी।
उम्र के इस पड़ाव में आकर समाचार पत्र निकालने की बरसो पुरानी हसरत को पूरा करना निसंदेह मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। यह चुनौती उस स्थिति में और अधिक बढ़ गई थी जब मेरे सम्पादन मंडल ने इस प्रोजेक्ट के सभी पहलुओं का अध्ययन कर इसे नि:शुल्क निकालने का फैसला लिया क्योंकि पिछले एक दशक के दौरान कई ऐसे समाचार पत्र भी समाज में आए, जिनका मकसद सैनी समाज को जागरूक करना या इसका उत्थान करने की बजाए या तो पैसा कमाना और या फिर किसी की व्यक्तिगत आलोचना करना रहा है। यही वजह थी कि एक समय सीमा के बाद या तो वे स्वयं ही बंद हो गये या फिर समाज ने उन्हें स्वीकार ही नहीं किया। ऐसी स्थिति में जब सम्पूर्ण समाज का भरोसा कम्युनिटी न्यूजपेपर की सार्थकता और इसके मालिकों की नीयत से उठ गया हो, वहां फिर से समाचार पत्र प्रकाशित करने का फैसला लेने सम्बंधी कदम का भविष्य क्या होगा, इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। मगर मैंने और मेरी टीम ने आमजन के भरोसे को फिर से कायम रखने का प्रण लेते हुए सैनी संवाद का प्रकाशन शुरू किया और सैनी समाज को यह बताने का प्रयास किया कि उनका मकसद लोगों की पर्ची काटकर अपने जेबें भरना नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त कम्युनिकेशन गैप को खत्म कर उसमें जागरूकता लाना है।
मैं शुक्रगुजार हूं सैनी समाज के बाशिंदों को जिन्होंने मेरी भावनाओं और मेरे काम का सम्मान करते हुए उस चुनौती को आसान बना दिया, जो मेरे लिए किसी युद्ध जीतने से कम नहीं थी। मुझे तसल्ली इस बात की है कि पिछले एक साल के दौरान हमने कोई भी ऐसा काम नहीं किया, जो सैनी समाज से जुड़े कई पत्र पूर्व में कर चुके हैं। न तो हमने सैनी समाज के किसी व्यक्ति विशेष या संगठन या संस्था के खिलाफ कोई जानबूझकर नकारात्मक रिपोर्टिंग की और न ही किसी के खिलाफ व्यक्तिगत आक्षेप वाली खबर छापने के एवज में उससे पैसे ऐंठने का प्रयास किया। ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ प्रकाशित करने के लिए हमारे पास कोई मसाला नहीं था। हमारे पास मसाला भी था और मसाला भी ऐसा की, जिससे सम्पूर्ण सैनी समाज में हड़कम्प मच जाए मगर हमारा काम किसी व्यक्ति को समाज में बेइज्जत करने की बजाए एक सकारात्मक सोच के साथ सैनी समाज के बाशिंदों को हर उस घटना या गतिविधि से अवगत करवाने की कोशिश करना था, जिसकी न्यूज वेल्यू हैं। इस एक साल की समयावधि के दौरान सैनी समाज से मिले रिस्पांस के बल पर हम यह बेहिचक कह सकते हैं कि सैनी समाज ने हमारी इस सोच को सही मानते हुए हमें अपना पूर्ण सहयोग दिया। यही वजह थी कि इस एक वर्ष की समयावधि के दौरान राज्य के विभिन्न जिलों से दर्जनों सुधी पाठकों ने हमें पत्र लिखकर सैनी संवाद का एक न्यूनतम मूल्य निर्धारित करने का सुझाव भी दिया मगर उन सबको हमारा यही जवाब था कि जब तक सैनी संवाद की पहचान सैनी समाज का उत्थान व कल्याण चाहने वाले एक समाचार पत्र के रूप में नहीं बन जाती तब तक सैनी संवाद नि:शुल्क तौर पर पाठकों तक पहुंचाया जाएगा और इसकी कोई भी सदस्यता फीस नहीं रखी जाएगी।
सैनी संवाद को और अधिक जनप्रिय व सामग्रीयुक्त बनाने के लिए यदि आपके पास भी कोई सुझाव है तो आप हमें बेहिचक दे सकते हैं, आपके सुझाव को पूरी तवज्जो दी जाएगी।

                                                                                           -चन्द्रप्रकाश सैनी

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