महान क्रांतिकारी व प्रेरणा स्त्रोत थे ज्योति बा फूले
चन्द्रप्रकाश सैनी
प्रधान सम्पादक
इसमें कोई दो राय नहीं है कि महात्मा ज्योति राव फूले को 19वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में हुए समाज सुधारकों में एक विशेष दर्जा प्राप्त है क्योंकि जहां दूसरे समाज सुधारकों ने परिवार व विवाह की समाजिक स्वीकृति एवं मान्यता से सम्बंधित महिलाओं के अधिकारों पर अपना ध्यान केंद्रीत रखा, वहीं ज्योति राव ने शैक्षणिक प्रणाली में अमूल-चूल बदलाव के साथ-साथ समाज में व्याप्त उस जातीय भेदभाव को भी जड़ मूल से खत्म करने के लिए संजीदा प्रयास किये, जिसका दंश उस समय खासतौर पर दबी-कुचली जातियों के लाखों लोगों को भुगतना पड़ रहा था। उनके द्वारा इन दो क्षेत्रों में किये गये अथाह प्रयासों का ही प्रतिफल था कि वे जहां शिक्षा को पिछड़ों व निम्र जातियों के लोगोंं विशेषकर गरीब महिलाओं तक पहुंचाने में कामयाब रहे, वहीं उन्होंने तर्कसंगत दलीलें देने के साथ-साथ अनेक व्यवहारिक कदम भी उठाकर ऊंची व नीची जातियों के बीच उत्पन्न भेदभाव की खाई को भी काफी हद तक पाटने का काम किया। यही वजह है कि उन्हें आज भी मैन ऑफ राइटस की संज्ञा दी जाती है।
कठिनाइयों में गुजरा बचपन
ज्योति बा फूले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता गोविंदराम फूले, जो कि मूल रूप से पूना के रहने वाले थे, सब्जी बेचकर अपने व अपने परिवार को गुजर बसर करते थे। ज्योति बा के दादा जी व उनके दो चाचा पूना में फूल का काम किया करते थे और तभी से इनके नाम के आगे फूले शब्द जुड़ गया था।
ज्योति बा का बचपन बड़ी परेशानियों में गुजरा था और वे जब कुछ ही महीनों के थे तो उनके सिर से मां का साया उठ गया था। चूंकि ज्योति राव के परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी इसलिए खेती व बागवानी में अपने पिता का हाथ बंटाने के लिए उन्हें प्राथमिक शिक्षा के बाद ही मजबूरीवश स्कूल छोडऩा पड़ा था और महज 13 साल की उम्र में ही ज्योति बा की शादी तय कर दी गई थी। ज्योति बा शुरूआत से ही होशियार व ज्ञानशील थे इसी वजह से उनके दो पड़ोसियों, जिनमें से एक मुस्लिम व एक ईसाई था, ने गोविंद राव को उन्हें आगे पढ़ाने के लिए जैसे-तैसे राजी कर लिया था। तभी ज्योति बा के जीवन में एक नया मोड आया और उन्होंने वर्ष 1841 में पूना के स्कोटिस मिशनस हाई स्कूल में दाखिला ले लिया। यहीं पर उनकी ब्राह्मण समाज के छात्र सदाशिव बलाल गोवंदे से मुलाकात व दोस्ती हुई, जो कि उनके साथ नि:स्वार्थ भाव से ताउम्र चलती रही। मोरो विठाल वालवेकर व शेखराम यशवंत परांजपे दो अन्य ऐसे ब्राह्मण मित्र थे, जिन्होंने ज्योति बा द्वारा चलाई गई सभी गतिविधियों में बढ़चढ़ कर न केवल उनका सहयोग दिया, बल्कि उन्हें कामयाब बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वर्ष 1847 में ज्योति बा ने अपनी सैकेंडरी की पढ़ाई पूरी की तथा यह कहते हुए सरकारी नौकरी करने से इंकार कर दिया कि वे अपना जीवन समाज में फैली अस्पृश्यता एवं अराजकता को दूर करने तथा शिक्षा को धरातल तक पहुंचाने में समर्पित करेंगे।
यूं मिली समाज सुधार की प्रेरणा
जातीय भेदभाव को दूर करने की प्रेरणा ज्योति राव को वर्ष 1848 में उनके साथ हुई एक घटना के बाद मिली। दरअसल ज्योति राव के ब्राह्मण मित्रों ने उन्हें एक ब्राह्मण की शादी में आमंत्रित किया था। ज्योति राव भी अपने मित्रों के साथ बारात में शामिल हुए और फेरे के वक्त जैसे ही दुल्हा मंडप पर जाने लगा तो दुल्हे के रिश्तेदारों ने ज्योति राव को यह कहते हुए दुल्हे से दूर कर दिया कि वे पिछड़ी जाति सैनी से संबंध रखते है। यह बात ज्योति राव को काफी महसूस हुई और वे आंखों में आंसू लिये उस शादी से वापस घर लौट आये तथा उन्होंने इस घटनाक्रम से अपने पिता को अवगत करवाया। इस घटना के बाद ही ज्योति राव ने समाज में पिछड़ी व निम्र जातियों के साथ होने वाले भेदभाव को दूर करने का प्रण लिया और पिछड़ी व निम्र जातियों को उनका हक दिलवाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया। यही से ही ज्योति राव के समाज सुधार आंदोलन की शुरूआत मानी जाती है।
दबे-कुचलो को की शिक्षा प्रदान
ज्योति राव का मानना था कि महिलाओं तथा पिछड़ी व निम्र जातियों को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा की जरूरत सबसे ज्यादा इन्हीं को है। इसलिए सबसे पहले उन्होंने अपनी अनपढ़ पत्नी सावित्री बाई को पढ़ाना शुरू किया और फिर अगस्त 1848 में एक गल्र्ज स्कूल की स्थापना की। ज्योति राव की यह मुहिम उनके विरोधी लोगों का रास नहीं आई और उन्होंने ऊंची जाति के किसी भी शिक्षक को उस स्कूल में जाने नहीं दिया। ऐसा होने के बावजूद ज्योति राव ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई को ही निम्र जातियों की लड़कियों को पढ़ाने के लिए कह दिया। यह भी उनके विरोधियों को नागवार साबित हुआ और उन्होंने ज्योति राव व उनकी पत्नी पर पत्थर फैंकने शुरू कर दिये। जब इससे भी बात नहीं बनी तो उन्होंने ज्योति राव के पिता को उनकी गतिविधियों को रोकने अन्यथा इन्हें घर से निकालने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। यही वजह थी कि ज्योति राव व उनकी पत्नी को मजबूरन अपना घर छोडऩा पड़ा मगर उन्होंने स्कूल को बंद नहीं किया।
चूंकि सभी लड़कियों को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही थी इसलिए पैसों के अभाव में कुछ समय बाद यह स्कूल बंद हो गया। मगर ज्योति राव ने हिम्मत नहीं हारी और कुछ समय बाद अपने दो ब्राह्मण दोस्तों- गोवंदे व वालवेकर- की मदद से 3 जुलाई 1851 में निम्र व पिछड़ी जातियों की लड़कियों को शिक्षा देने के लिए फिर से स्कूल शुरू कर दिया। इसके कुछ समय बाद ही ज्योति राव ने समीपवर्ती इलाकों में भी दो अन्य स्कूल खोल दिये। उस समय तत्कालीन ब्रिट्रिश सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकतम बजट उच्चतर शिक्षा पर खर्च किया जाता था और प्राथमिक शिक्षा के लिए यह राशि कम रखी गई थी। ज्योति राव ने अपनी दलीलों से ब्रिट्रिश सरकार को प्राथमिक शिक्षा के महत्व से अवगत करवाया और उन्हें प्राथमिक शिक्षा पर उच्चतर शिक्षा के अनुरूप से बजट खर्च का प्रावधान करने के लिए मजबूर किया।
विधवा विवाह का किया सूत्रपात
ज्योति राव के काल में हिंदू सोसायटी की ऊंची जातियों में न केवल विधवा विवाह पूरी तरह से प्रतिबंधित था, बल्कि बाल विवाह का भी जबरदस्त प्रचलन था। यही वजह थी कि अनेक ऐसी महिलाओं को अपना जीवन जीने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था जो कि अपने यौवन काल में ही विधवा हो गई थी। ऐसी स्थिति में अनेक महिलाओं के अवैध सम्बंध भी हुए और इससे जन्मी संतानों को उन्होंने लोक लाज के भय से या तो गलियों में छोड़ दिया या फिर जन्म से पूर्व ही कोख में उनकी हत्या कर दी। समाज में चल रही इस प्रथा से ज्योति राव काफी आहत थे इसलिए उन्होंने अनाथालय की स्थापना कर दी। जहां पर ज्योति राव ने गर्भवती महिलाओं को सुरक्षा प्रदान की और उन्हें यह भरोसा दिलवाया कि उनके बच्चों का लालन-पालन इस अनाथालय में भलीभांति किया जायेगा। यही वजह थी कि वर्ष 1873 में एक ब्राह्मण विधवा ने इस अनाथालय में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसे बाद में ज्योति राव ने गोद लेकर उसका पालन-पोषण किया।
सत्य शोधक समाज का गठन
ज्योति राव फूले ने निम्र व पिछड़ी जातियों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए 24 सितम्बर 1873 में अपने समर्थकों की एक बैठक कर सत्य शोधक समाज का गठन किया। ज्योति राव इसके संस्थापक अध्यक्ष व कोषाध्यक्ष थे। सत्य शोधक समाज का गठन शूद्रों व दलितों को उनके अधिकार दिलवाने के साथ-साथ एक जाति विशेष द्वारा उन पर ढहाये जा रहे सितम पर भी अंकुश लगाना था। ज्योति राव ने इस संगठन की मैम्बरशिप सभी बिरादरियों के लोगों के लिए ओपन की थी जिस वजह से कुछ ही समय में इसके 316 सदस्य बन गये थे। इसके बाद ज्योति राव ने सार्वजनिक धर्मा पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने पुरुषों व महिलाओं के समान अधिकारों की वकालत करते हुए समाज से महिलाओं पर लगाये गये अनेक फिजूल एवं बेतुके सामाजिक बंधनों का हटाने का आह्वान किया।
विक्टोरिया अनाथालय का गठन
वर्ष 1876 में ज्योति राव को पूना नगर पालिका का नामांकित सदस्य नियुक्त किया गया था। जहां उन्होंने भूखमरी के चलते गांव छोड़ रहे महाराष्ट्र के विभिन्न इलाकों के लोगों की पूरजोर मदद करने का प्रयास किया क्योंकि भूखमरी के चलते महाराष्ट्र के विभिन्न इलाकों के लोग न केवल पलायन कर रहे थे बल्कि अपने बच्चों को भी लावारिश छोडऩे पर मजबूर थे। ऐसी स्थिति में ज्योति राव ने सत्य शोधक समाज के अंतर्गत विक्टोरिया अनाथालय खोलने का निर्णय लेते हुए इसे कुशलतापूर्वक क्रियान्वित किया। इस काम में उनके ब्राह्मण मित्रों ने भी उनका भरपूर सहयोग दिया, जिसके चलते ज्योति राव काफी संख्या में बेसहारा लोगों व बच्चों की सुरक्षा व उनकी मदद करने में कामयाब रहे।
जीवन की अंतिम सांस तक चलता रही अधिकारों की लड़ाई
दबे-कुचलों को उनका हक दिलवाने तथा उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के प्रति उत्साहित करने एवं इसके लिए माहौल तैयार करने हेतु ज्योति राव फूले द्वारा जवानी में छेड़ा गया संघर्ष उनकी जीवन की अंतिम सांसों तक चलता रहा। बात चाहे अछूतों को मुख्य धारा में शामिल करवाने के लिए अपने घर के नजदीक बाथिंग टैंक बनाने की हो या फिर एक जाति विशेष के विरोध के बावजूद अपने स्तर पर स्कूल खोलकर महिलाओं को शिक्षा प्रदान करने की और या फिर शूद्रों का जीवन नरक बनाने वाली जातियों की सार्वजनिक मंचों पर खिलाफत कर उन्हें अपनी सोच बदलने के लिए मजबूर करने की ही क्यों न हो, ज्योति राव फूले ने हर मामले में अपनी आवाज को मुखर किया और विकट परिस्थितियों में भी हौंसला न खोते हुए एक दंबगई से दबे-कुचलों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। 28 नवम्बर 189० को इस महान शख्सियत का स्वर्गवास हो गया।