सोमवार, दिसंबर 06, 2010

चौ. रणबीर सिंह की मदद ने बनाया मालिक

मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पिता स्व. चौ. रणबीर सिंह की दूसरी बरसी पर विगत 26 नवम्बर को जहां सम्पूर्ण हरियाणा ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की, वहीं मुझे भी उनके साथ बिताये कुछ ऐसे पल या फिर यूं कहिये उनके द्वारा मुझे प्रेरणा प्रदान करने वाली कही गई कुछ ऐसी बातें भी याद आईं, जिन्हें मैं जीवन पर्यंत भूला नहीं पाऊंगा। चौधरी रणबीर सिंह से मेरी पहली मुलाकात 14 साल की आयु में वर्ष 1957 में हुई थी। चौधरी साहब उस वक्त हरियाणा के पूर्व राज्यपाल चौ. सुलतान सिंह, पूर्व एम.एल.ए. मास्टर नान्हूराम, कांग्रेसी नेता बद्री प्रसाद काला, चौ. थान सिंह व श्री पूर्णचंद आजाद के साथ छोटूराम पार्क चौक स्थित हमारे दीप भोजनालय पर आया करते थे। चौधरी साहब के मेरे ताऊजी स्व. जोतराम सैनी से घनिष्ठ सम्बंध थे इसलिए मैं भी उन्हें ताऊजी कहकर ही सम्बोधित करने लगा था। चूंकि चौधरी साहब बच्चों और युवा वर्ग से खासा लगाव रखते थे इसलिए मैं भी जल्द ही उनके चहेतों में शामिल हो गया था। तत्पश्चात मैं चौ. छोटूराम के पोते चौ. महताब सिंह व मेरे सहपाठी रहे मामन सिंह के साथ चौधरी साहब से मिलने अक्सर उनकी कोठी पर जाने लगा था। यह सिलसिला लगातार कई सालों तक जारी रहा और तब तक दीप भोजनालय को चलाने की जिम्मेवारी मेरे ताऊजी से होते हुए मेरे पिता स्व. दीपचंद सैनी और फिर मेरे कंधों पर आ गई थी। मुझे याद है चौधरी साहब हमारे भोजनालय के पीछे स्थित भगवान कालोनी में रहने वाले किलोई हलके के कुछ लोगों से अमूमन मिलने आया करते थे और जब भी वहां आते तो मेरे भोजनालय में दाल का स्वाद चखने के साथ-साथ मेरे घर-परिवार का कुशलक्षेम पूछना नहीं भूलते थे। करीब 30 सालों तक मेरा उनसे सम्पर्क रहा और इस दौरान हमेशा मुझसे मेरे बच्चों के बारे में पूछते हुए यह कहने से नहीं चूकते थे कि चन्द्र बेटे बच्चों को अच्छी और उच्च शिक्षा दिलवाना क्योंकि शिक्षा सुसंगठित, स्वच्छ एवं तारतम्य समाज के निर्माण में तो महत्ती भूमिका अदा करती ही है साथ ही साथ बच्चों में सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों का विकास भी करती है। यह उन्हीं की प्रेरणा का ही नतीजा था कि मैंने अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाई और आज मेरे तीनों पुत्र अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं। मुझे याद है जब सन् 1987 में मेरे बड़े बेटे विजय की जॉब दिल्ली सरकार में लगी तो मैं उनके मॉडल टाऊन स्थित निवास पर उन्हें यह खुशखबरी देने गया। यह सुनकर वे बहुत खुश हुए और उन्होंने तुरंत अपने किसी करीबी को बाजार भेजकर मिठाई मंगवाई तथा वहां उपस्थित सभी लोगों को मिठाई खिलाकर अपनी खुशी का इजहार किया। इसी तरह जब मेरे दूसरे बेटे संजीव ने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में टॉप पोजीशन हासिल कर गोल्ड मैडल पाने की सूचना मैंने चौधरी साहब को दी थी तब भी उन्होंने यह कहकर मेरा हौंसला अफजाई की थी कि किसी भी पिता की असली पूंजी उसकी सन्तान होती है और तुमने अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाकर उस पंूजी को हासिल कर लिया। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ वे जरूरतमंदों की हरसंभव मदद करने का आह्वान करने के अलावा खुद भी उनकी मदद करने में गुरेज नहीं करते थे। चौधरी साहब जब संयुक्त पंजाब में सिंचाई मंत्री हुआ करते तो उस समय मेरा भोजनालय किराये की इमारत में चला करता था। इस इमारत को खाली करवाने के लिए इमारत के मालिक ने कोर्ट में केस दायर कर रखा था। सालों-साल चले इस मुकदमें में मेरी कानूनन हार के बाद एक दिन मालिक ने पुलिस के जरिये इस इमारत को खाली करवाने की कोशिश की। चूंकि मेरे ऊपर ही पूरे परिवार, जिसमें मेरे बच्चों के साथ-साथ मेरे माता-पिता, पत्नी व बच्चों के अलावा अन्य भाई-बहन भी शामिल थे, के पालन-पोषण की जिम्मेवारी थी। मैं अपनी इस समस्या को लेकर जब चौधरी साहब से मिला तो पहले तो उन्होंने मुझे सरकारी नौकरी दिलवाने का ऑफर दिया मगर तब नौकरी में तनख्वाह कम होने की वजह से जब मैंने उनका ऑफर ठुकरा दिया तो उन्होंने मेरे सामने ही एस.पी. को  फोन कर मकान मालिक को इमारत पर कब्जा न लेने के आदेश दे डाले। साथ ही मालिक पर इस सम्पत्ति को मुझे बेचने का दबाव भी बनाया। चौधरी साहब द्वारा संकट के समय की गई इसी मदद से मैं आज स्वयं इस इमारत का मालिक हूं और भगवान की दया से मेरे बच्चे भी अच्छा जीवन यापन कर रहे हैं। चौधरी साहब ने उस संकट की घड़ी में मेरी जो मदद की, उसे मैं जीवनभर नहीं भूला पाऊंगा क्योंकि यदि उस वक्त मैं बेरोजगार हो जाता तो शायद अपने परिवार का पालन-पोषण भलीभांति नहीं कर पाता।  लिहाजा जरूरतमंदों की मदद करने वाली ऐसी महान आत्मा को मैं शत-शत नमन करता हूं।
                                                                                                     -चन्द्रप्रकाश सैनी, प्रधान सम्पादक

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