महज 13 साल की उम्र में खो दी थी आंखों की रोशनी
अम्बाला। जब हौंसले बुलंद हो और तन्मयता से पुरुषार्थ किया जाये तो कामयाबी मिलना लाजमी है। अगर कोई ऐसी बेबस लड़की इस सूत्र को अपने जीवन में आत्मसात कर कोई विशेष मुकाम हासिल करें, जिसकी आंखों की रोशनी सालों पहले ही काल का ग्रास बन गई तो इसे निसंदेह ज़ज्बे की ही जीत कहा जायेगा और ऐसी ही एक जीत की स्वयं अनुभूति करने के साथ-साथ आम जनमानस के समक्ष भी बराड़ा कस्बे के हरदोई गांव की सरिता सैनी ने एक मिसाल पेश की है। महज 13 साल की उम्र में अपनी दोनों आंखें गंवा चुकी सरिता सैनी दुराना गांव के सरकारी स्कूल में इतिहास विषय की लैक्चरर्र है और उनकी कक्षा में अनुशासन का आलम यह है कि यदि कोई बच्चा चूं तक की आवाज करता है तो सरिता उसे उसके नाम के साथ सम्बोधित कर उसे अनुशासन बनाये रखने की ताकीद देती है। सरिता का कक्षा के 30 बच्चों को पढ़ाने का तरीका देखकर कोई भी यह सहज ही अंदाजा नहीं लगा सकता कि सरिता देख नहीं पातीं है। सरिता को अपनी क्लास के हर बच्चे की आवाज की पहचान है और इसके जरिये ही वह क्लास में अनुशासन बनाए रखती हैं। सरिता 13 साल की उम्र तक इस खूबसूरत दुनिया को देख सकती थीं। मगर उस साल अचानक बुखार के कारण आंखों की नसें सूख गईं और नयनों का नूर चला गया। इस घटना से सरिता के पिता गुरमीत सिंह और माता प्यारी देवी टूट गए लेकिन सरिता ने न धैर्य छोड़ा और न पढ़ाई..। उन्होंने न सिर्फ स्कूलव कालेज की पढ़ाई पूरी की, बल्कि बीएड में भी अच्छे अंक हासिल किए। हौंसले से सराबोर सरिता कहती हैं, 'अगर मेरी आंखों की रोशनी नहीं गई होती तो शायद मैं आज इस मुकाम पर नहीं पहुंच पाती क्योंकि हमारे यहां गांवों में लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाती है। अगर मेरी आंखें भी ठीक होतीं तो स्कूल की पढ़ाई के बाद मेरी भी शादी कर दी जाती। सरिता के घर में माता पिता के अलावा एक भाई और बहन है। यह पूछने पर कि पढ़ाई के अलावा वह बच्चों की कापियां वगैरह कैसे चेक करती हैं? सरिता ने कहा, 'इसमें मैं क्लास मॉनीटर और होशियार बच्चों की मदद लेती हूं। इसके अलावा चूंकि 11वीं कक्षा में होम एग्जाम होते हैं और बच्चों की कापियां चैक कर नंबर मुझे ही देने होते हैं इसलिए मैं बच्चों की आंसर शीट घर ले जाती हूं। वहां बहन मुझे बच्चों के उत्तर पढ़कर सुना देती है और मैं उसका मूल्यांकन कर नंबर दे देती हूं। इसे लेकर मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई।Óसरिता बताती हैं कि जब वह नौवीं में थीं तो उन्हें तेज बुखार हो गया था। कुछ दिन बाद तबीयत ज्यादा बिगडऩे पर वह बेहोश हो गई तो पापा उसे पीजीआई चंडीगढ़ ले गए। वहां जब अगले दिन होश आया तो उसे सब चीजें दो-दो दिखाई देने लगीं। उसी दिन उसे अपने पापा भी दो दिखे मगर उसके बाद वह अपने पिता तो कभी नहीं देख पाई। उसकी आंखों की रोशनी जा चुकी थी। उन्होंने बताया कि आंखों की रोशनी जाने के बाद उनके पिता ने उसे पानीपत के ब्लाइंड स्कूल में दाखिला दिलवा दिया लेकिन कुछ दिन बाद ही वह स्कूल छोड़ कर घर आ गई। इसके कुछ साल बाद उसने घर में ही दसवीं कक्षा की तैयारी की और पेपर दिए। गवर्नमेंट स्कूल से ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा पास की। स्कूली पढ़ाई के बाद सरिता ने अम्बाला कैंट के आर्य कालेज में बीए में दाखिला लिया। उसके साथ उसकी बहन कालेज आती थी। 2007 में पीकेआर जैन कालेज से बीएड और 2008 में गवर्नमेंट कालेज से इतिहास विषय में एमए की।
अम्बाला। जब हौंसले बुलंद हो और तन्मयता से पुरुषार्थ किया जाये तो कामयाबी मिलना लाजमी है। अगर कोई ऐसी बेबस लड़की इस सूत्र को अपने जीवन में आत्मसात कर कोई विशेष मुकाम हासिल करें, जिसकी आंखों की रोशनी सालों पहले ही काल का ग्रास बन गई तो इसे निसंदेह ज़ज्बे की ही जीत कहा जायेगा और ऐसी ही एक जीत की स्वयं अनुभूति करने के साथ-साथ आम जनमानस के समक्ष भी बराड़ा कस्बे के हरदोई गांव की सरिता सैनी ने एक मिसाल पेश की है। महज 13 साल की उम्र में अपनी दोनों आंखें गंवा चुकी सरिता सैनी दुराना गांव के सरकारी स्कूल में इतिहास विषय की लैक्चरर्र है और उनकी कक्षा में अनुशासन का आलम यह है कि यदि कोई बच्चा चूं तक की आवाज करता है तो सरिता उसे उसके नाम के साथ सम्बोधित कर उसे अनुशासन बनाये रखने की ताकीद देती है। सरिता का कक्षा के 30 बच्चों को पढ़ाने का तरीका देखकर कोई भी यह सहज ही अंदाजा नहीं लगा सकता कि सरिता देख नहीं पातीं है। सरिता को अपनी क्लास के हर बच्चे की आवाज की पहचान है और इसके जरिये ही वह क्लास में अनुशासन बनाए रखती हैं। सरिता 13 साल की उम्र तक इस खूबसूरत दुनिया को देख सकती थीं। मगर उस साल अचानक बुखार के कारण आंखों की नसें सूख गईं और नयनों का नूर चला गया। इस घटना से सरिता के पिता गुरमीत सिंह और माता प्यारी देवी टूट गए लेकिन सरिता ने न धैर्य छोड़ा और न पढ़ाई..। उन्होंने न सिर्फ स्कूलव कालेज की पढ़ाई पूरी की, बल्कि बीएड में भी अच्छे अंक हासिल किए। हौंसले से सराबोर सरिता कहती हैं, 'अगर मेरी आंखों की रोशनी नहीं गई होती तो शायद मैं आज इस मुकाम पर नहीं पहुंच पाती क्योंकि हमारे यहां गांवों में लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाती है। अगर मेरी आंखें भी ठीक होतीं तो स्कूल की पढ़ाई के बाद मेरी भी शादी कर दी जाती। सरिता के घर में माता पिता के अलावा एक भाई और बहन है। यह पूछने पर कि पढ़ाई के अलावा वह बच्चों की कापियां वगैरह कैसे चेक करती हैं? सरिता ने कहा, 'इसमें मैं क्लास मॉनीटर और होशियार बच्चों की मदद लेती हूं। इसके अलावा चूंकि 11वीं कक्षा में होम एग्जाम होते हैं और बच्चों की कापियां चैक कर नंबर मुझे ही देने होते हैं इसलिए मैं बच्चों की आंसर शीट घर ले जाती हूं। वहां बहन मुझे बच्चों के उत्तर पढ़कर सुना देती है और मैं उसका मूल्यांकन कर नंबर दे देती हूं। इसे लेकर मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई।Óसरिता बताती हैं कि जब वह नौवीं में थीं तो उन्हें तेज बुखार हो गया था। कुछ दिन बाद तबीयत ज्यादा बिगडऩे पर वह बेहोश हो गई तो पापा उसे पीजीआई चंडीगढ़ ले गए। वहां जब अगले दिन होश आया तो उसे सब चीजें दो-दो दिखाई देने लगीं। उसी दिन उसे अपने पापा भी दो दिखे मगर उसके बाद वह अपने पिता तो कभी नहीं देख पाई। उसकी आंखों की रोशनी जा चुकी थी। उन्होंने बताया कि आंखों की रोशनी जाने के बाद उनके पिता ने उसे पानीपत के ब्लाइंड स्कूल में दाखिला दिलवा दिया लेकिन कुछ दिन बाद ही वह स्कूल छोड़ कर घर आ गई। इसके कुछ साल बाद उसने घर में ही दसवीं कक्षा की तैयारी की और पेपर दिए। गवर्नमेंट स्कूल से ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा पास की। स्कूली पढ़ाई के बाद सरिता ने अम्बाला कैंट के आर्य कालेज में बीए में दाखिला लिया। उसके साथ उसकी बहन कालेज आती थी। 2007 में पीकेआर जैन कालेज से बीएड और 2008 में गवर्नमेंट कालेज से इतिहास विषय में एमए की।


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