शनिवार, जून 12, 2010

सैनी समाज को नाज है ऐसी शख्सियतों पर

59 बरस के हुए अशोक गहलौत

चन्द्रप्रकाश सैनी
प्रधान सम्पादक
राजस्थान के मुख्यमंत्री एवं सैनी समाज के आभूषण अशोक गहलौत विगत 3 मई को 59 बरस के हो गए। साधारण परिवार में जम्र लेने के बावजूद अपनी मेहनत व कौशल के बल पर हिंदुस्तान की राजनीति में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है, वह किसी मिसाल से कम नहीं है। निसंदेह यह सम्पूर्ण सैनी समाज के लिए एक गर्व का विषय है कि अशोक गहलौत राजस्थान सरीखे एक बड़े राज्य की कमान संभालने के साथ-साथ केंद्र की राजनीति में भी अपनी एक विशेष जगह बनाए हुए हैं।
वर्ष 1951 में जोधपुर में रहने वाले साधारण किसान लक्ष्मण सिंह गहलौत के घर जन्मे अशोक गहलौत छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय थे इसलिए उन्हें वर्ष 1974 से 1979 तक एनएसयूआई का प्रदेशाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। बी.एस.सी. के बाद अर्थशास्त्र में एम.ए. की डिग्री हासिल कर अशोक गहलौत पहली बार महज 29 साल की उम्र में वर्ष 1980 में जोधपुर से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। इसके दो साल बाद 2 सितम्बर 1982 में उन्हें तवव्जो देते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मंत्रालय में उपपर्यटन व जहाजरानी मंत्री बनाया गया था। कुछ समय मंत्री पद से दूर रहने के बावद उन्हें वर्ष 1984 में फिर से इस पद से नवाजा गया और वे 7 फरवरी 1984 से 31 अक्तूबर 1984 तक इस पद रहे। इसके उपरांत उन्हें उप खेलमंत्री का पदभार सौंप दिया गया, जिस पर उन्होंने 12 नवम्बर से 31 दिसम्बर 1984 तक कार्य किया। जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो अशोक गहलौत को फिर से पर्यटन व जहाजरानी मंत्री बनाया गया और उन्होंने यह कार्यभार 25 सितम्बर 1985 तक संभाला। वे कुल मिलाकर वे चार बार- सातवीं, आठवीं दसवीं व ग्यारहवीं योजना-में जोधपुर से लोकसभा सदस्य चुने गए।
अशोक गहलौत छोटी उम्र में ही कांग्रेस पार्टी के अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके थे। उनके इसी प्रशासनिक अनुभव को मद्देनजर रखते हुए उन्हें वर्ष 1985 में पहली बार राजस्थान प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। इस दौरान उनका कार्य सराहनीय रहा और उन्होंने आमजन को कांग्रेस से जोड़कर पार्टी को और मजबूती प्रदान की। इसी कारण वर्ष 1994 व 1997 में उन्हें फिर से प्रदेशाध्यक्ष बना दिया। इससे पूर्व वर्ष 1989 में कांग्रेस के राजस्थान में सत्ता में आने पर उन्हें गृह मंत्रालय सरीखे एक बड़े मंत्रालय की कमान सौंपी गई। इसके बाद वर्ष 1991 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी तो वे केंद्र में चले गए, जहां उन्हें टैक्सटाइल मिनिस्टर का स्वतंत्र प्रभार दिया गया। उन्होंने यह प्रभार 18 जनवरी 1993 तक संभाले रखा। अशोक गहलौत द्वारा हर जिम्मेवारी के कुशलतापूर्वक निभाने की वजह से उन्हें वर्ष ृ1998 में राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया। चूंकि तब तक वे विधानसभा के सदस्य नहीं थे इसलिए उन्होंने वर्ष 1999 में अपने लोकसभा क्षेत्र के सदरपुरा विधानसभा हलके से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत हासिल कर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद वे लगातार दो बार फिर से इसी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए और 11 दिसम्बर 2008 में हुए विधानसभा चुनाव कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद उन्हें फिर से राजस्थान का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया।
इससे पूर्व, वे लोकसभा की पब्लिक एकाऊंट कमेटी, सम्प्रेषण सलाहकार समिति, स्टेंडिंग कमेटी ऑन रेलवे तथा विदेशी मामलों की सलाहकार समिति के सदस्य भी रह चुके हैं। जहां तक कांग्रेस पार्टी की बात है तो एनएसयूआई के प्रदेशाध्यक्ष के अलावा वे वर्ष 2004 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव, दिल्ली, हिमाचल, छत्तीसगढ़ तथा कांग्रेस सेवादल के प्रभारी भी रह चुके हैं। राजनीति के अलावा समाजसेवा में भी अशोक गहलौत की खासी दिलचस्पी रही है। वर्ष 1971 में हुए बंगलादेश युद्ध में उन्होंने शरणार्थियों के कल्याण के लिए बढ़चढ़ कार्य किए। साथ ही नेहरू युवा केंद्र के माध्यम से प्रौढ़ शिक्षा के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे कुमार साहित्य परिषद तथा राजीव गांधी मैमोरियल बुक बैंक, जोधुपर से भी सक्रिय तौर पर जुड़े रहे हैं।

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