शुक्रवार, नवंबर 06, 2009

ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम

चन्द्रप्रकाश सैनी
प्रधान सम्पादक


इस विधानसभा चुनाव में सभी राजनैतिक दलों ने सैनी समाज के नेताओं को अपनी टिकटें देकर जो भरोसा दिखाया था, महज एक को छोड़कर अन्य सभी प्रत्याशी इस भरोसे को कायम रखने में नाकामयाब रहे हैं। चुनाव परिणामों ने सैनी प्रत्याशियों की जो हालत बयां की है, वह ना खुदा ही मिला ना विशाले सनम जैसी स्थिति से कम नहीं है क्योंकि इन चुनावों में हम न तो उन सीटों को जीत पाने में कामयाब हो पाए, जहां वोटों के लिहाज से हम काफी मजबूत स्थिति में थे और न ही हम राजनैतिक दलों को अपनी ताकत का अहसास करवा पाए। सैनी समाज को शुक्रगुजार होना चाहिए डा. बिशन लाल सैनी का, जिन्होंने अपने दम पर चुनावी वैतरणी को पार लगाकर विधानसभा में सैनी समाज को प्रतिनिधित्व दिलवाया अन्यथा जिन लाड़वा व नारनौल की दो सीटों पर हम अपनी जीत तय मानकर चल रहे थे, वहां अपनी ही बिरादरी के अन्य प्रत्याशियों ने उन्हें हरवाने में अहम भूमिका निभाई। लाड़वा से कांग्रेस प्रत्याशी कैलाशो सैनी को 2,505 मतों के अंतर से हार का मुहं देखना पड़ा जबकि इसी सीट पर चुनाव लड़ रही बसपा प्रत्याशी शशि सैनी ने 9,617 वोट लेकर कैलाशो की हार का मार्ग प्रशस्त्र किया। इसी तरह नारनौल से इनेलो टिकट पर 3,392 वोटों से पराजित हुए भानाराम सैनी भी जीत दर्ज कर सकते थे, यदि उन्हें सैनी समाज का सम्पूर्ण समर्थन मिला होता। यहां से भी सैनी समाज के एक अन्य प्रत्याशी पुरुषोत्तम सैनी बसपा टिकट पर चुनाव मैदान में थे।
अगर अन्य सीटों की बात की जाए तो वहां सैनी नेताओं के लिए जीत के अनुकूल स्थिति थी ही नहीं, इसलिए उन सीटों पर हारने की वजह या तो स्वयं प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि जिम्मेवार रही या फिर वह पार्टी, जिसकी टिकट पर वे चुनावी मैदान में ताल ठोंक रहे थे।

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