प्रदीप सैनी ने दे रखी है अंधेपन को मात
नई दिल्ली: उनकी दुकान रात के अंधेरे में भी खुली रहती है क्योंकि उनके लिए दिन के उजाले और रात के अंधेरे में कोई फर्क नहंी है। उनकी दुनिया हमारी तरह रंगीन नहीं है। उनकी दुनिया में एक ही रंग है ब्लैक। जी हां, वे देख नहीं सकते पर जिंदगी से लडऩे का जज्बा उनमें कुछ ऐसा है कि अच्छे-अच्छे को शर्म आ जाए। एक अंधेपन के अलावा यूरिन ब्लॉडर कैंसर से भी लड़ रहा है तो दूसरे ने यह ठान रखा है कि वह देख न पाने के बावजूद अपनी पढ़ाई जार रखेगा।लेकिन बात यहां खत्म नहीं हो जाती क्योंकि उन्हें सिर्फ अपने अंधेपन से ही नहीं लडऩा होता है बल्कि हर रोज शराबियों, भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों और पुलिस से भी जूझना पड़ता है। रात में चलने वाले नाइट क्लबों में भी बॉक्सर रखे जाते हैं जहां शहर की जैंट्री जाती है फिर ये तो सड़क किनारे रात में चाय, कोल्ड ड्रिंक बेचते हैं जहां हर तरह के लोगों को हर राज डील करना पड़ता है।मूल रूप से बिहार के कटिहार इलाके के रहने वाले 26 साल के प्रदीप सैनी दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्राचार से बीए कर रहे हैं। यही नहीं इस छोटी सी दुकान से वे अपने दो छोटे भाइयों की पढ़ाई का खर्चा भी उठाते हैं जो सातवीं और दसवीं कक्षा में पढ़ रहे हैं। उनका कहना है कि वे लोग यूं ही पटरी पर दुकान चलाने को मजबूर है। वे चाहते हैं कि कम से कम सरकार उन्हें एक जगह दे दें, जिसमें वे अपनी दुकान चला सकें और हर राजे की सिरदर्दी से बच सकें। उनकी दुकान में रात-बेरात आसपास रहने वाले स्टूडेंटस आकर जरूरत का सामान ले लेते हैं। उनके यहां नमकीन, बिस्कुट, मैगी वगैरह के अलावा राशन का जरूरी सामान भी मिल जाता है। पटरी पर चलने वाली यह दुकान ही इन दोनों का घर है लेकिन यहां भी उनकी मुश्किलें हैं। अभी तो दिन में कभी एमसीडी वाले और रात में पुलिस वाले हड़का जाते हैं। उन्होंने बताया कि बारिश के सीजन में तो पूरी दुकान में पानी भर जाता है। इस बात के लिए वे लोग मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से लेकर एमसीडी के अधिकारियों तक के चक्कर लगा लगा कर थक चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।करीब 30 साल के उमेश मंडल 1992 में कानपुर से दिल्ली आए थे । चेचक की वजह से अपनी अंाखों की रोशन खाने वाले उमेश ने बताया कि जब उन्हें अपने कैंसर के बारे में पता चला तब उन्होंंने अपने घरवालों से कोई मदद नहीं मांगी और अपने इलाज का सारा खर्चा खुद ही उठाया। हालांकि सरकारी अस्पतालों से उन्हें शिकायत है कि एम्स से लेकर योगानंद शास्त्री तक हर जगह से उन्हें धक्के ही खाने पड़े कहीं कोई इलाज नहीं हुआ। अपोलो में जरूर फ्री इलाज का वादा किया पर वहां भी दवाइयों का खर्चा खुद ही उठाना पड़ा, जो कि बस के बाहर की बात है। एक आप्रेशन भी हो चुका है और उसके बाद चलने फिरने से भी मोहताज होना पड़ा। डाक्ॅटर कहते हैं कि एक ऑप्रेशन और होना है पर अब तक पैसे नहीं जोड़ पाया हूं।प्रदीप और उमेश दोनों का बस यही कहना है कि सरकार अगर उन्हें बसा नहीं सकती तो कम से कम उजाड़े नहीं। कम से कम जो रोजी रोटी का जो सहारा है वो न छीने। प्रदीप इस साल गे्रजुएट हो जाएंगे, बस उनका इतना कहना है कि सरकार अगर उन्हें नौकरी नहंी दे सकती तो कम से कम दुकान चलाने के लिए एक जगह एलॉट कर दे जिससे वह खुद मेहनत करके जी सकें। साभार नवभारत टाइम्स

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