चंदर प्रकाश सैनी
जैसे-जैसे हरियाणा में विधानसभा चुनावों का समय नजदीक आता जा रहा है वैसे-वैसे सैनी बिरादरी के नेताओं में भी बड़े राजनैतिक दलों की टिकटों के लिए संघर्ष शुरू हो गया है। ऐसा होना स्वाभाविक भीथा क्योंकि नेताओं के
लिए चुनाव ही अपना सामथ्र्य सिद्ध करने और अपनी किस्मत बनाने का मौका होता है। मगर जिस प्रकार से सैनी बिरादरी के नेताओं में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी हुई है, वह कहीं इस बार भी बिरादरी के लिए घातक साबित न हो जाए, इससे इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि अभी तक हर चुनाव में यह होता आया है कि सैनी बिरादरी के किसी भी नेता को जब किसी बड़ी पार्टी का टिकट मिल जाता है तो बिरादरी के ही वे अन्य नेता उसे अपने आप ही अपना दुश्मन मान लेते हंै जो टिकट की स्पर्धा में उसके साथ दौड़ रहे थे और आखिरी वक्त पर बाजी हार गए। ऐसे समय में बिरादरी हितों को मद्देनजर रखते हुए होना तो यह चाहिए कि हारे हुए नेता भी राजनैतिक प्रतिस्पर्धा को एक तरफ रखते हुए स्वयं उस नेता के लिए वोट मांगे और उसे जीताने का भरसक प्रयास करें क्योंकि कोई भी बिरादरी व्यक्तिगत प्रयासों से न तो प्रगति कर सकती है और न ही संगठित हो सकती है। मगर क्या करें हमारे लिए बिरादरी के विकास की बजाए निजी सफलता ज्यादा जरूरी है। तभी तो हर चुनाव में हम किसी भी पार्टी से उतनी भी टिकटें हासिल नहीं कर पाते, जितनी सीटों पर हमारा हक बनता है। जैसे ही चुनाव नजदीक आते हैं वैसे ही हम अलग-अलग धड़ों में बंटकर अपने ही स्टाइल में कितनी भी सीटों की मांग राजनैतिक दलों के आकाओं से करने लगते हैं। कोई बिरादरी के लिए 10 सीटें मांगता है तो कोई 15 और कोई 20 सीटों पर ही अपनी दावेदारी पेश कर देता है। इतना सब होने के बावजूद किसी भी राजनीतिक दल पर आज तक हम इतना दवाब नहीं बना पाए है कि वह पूरी मांग मानने की बात तो दूर तीन या चार सीट भी हमारी झोली डाल दे। साथियों, एक बार फिर वही वक्त आ गया है और इस बार फिर हमारे पास मौका है कि हम अपनी ताकत राजनीतिक दलों को दिखाकर उनसे अपनी इस बरसों पुरानी मांग को मनवा सकें। मगर यह तभी संभव है जब हम एकजुट होकर इन दलों पर दबाव बनाए। यदि हम ऐसा नहीं कर पाए तो पुराने नतीजे में बदलाव की संभावना कम ही है।
